हमारे शास्त्रों में लिखा है “धारयति इति धर्मः” अर्थात जीवन को धारण करने, जीने के शाश्वत नियमों को धर्म कहा है। भारत के सुप्रीम कोर्ट ने भी हिन्दू धर्म को “Way of life” अर्थात जीवन-शैली बताया है। मनुष्य का शाश्वत संबंध मनुष्य से, परिवार से, समाज से, देश से, प्रकृति तथा पर्यावरण से है। इन संबंधों में जब विकृति तथा असंतुलन निर्माण होता है तो मनुष्य के साथ परिवार, समाज और देश में अशांति तथा अव्यवस्था के साथ-साथ पर्यावरण में प्रदूषण की समस्या भी खड़ी हो जाती है। आज का वर्तमान विश्व इन समस्याओं से जूझ रहा है।
वर्तमान का विश्व पाश्चात्य के भोगवादी चिंतन के नेतृत्व में चलने के कारण कुल 200–300 सौ वर्षों में ही विनाश का दृश्य उत्पन्न होता जा रहा है, जो आज के पर्यावरणविद तथा समाज के वैज्ञानिक स्वीकार रहे हैं। पर भारत में यह शाश्वत चिंतन, जिसके आधार पर हमारा देश भौतिक-वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक क्षेत्रों में विश्व का नेतृत्व करता रहा। विश्व गुरु भारत ही नहीं, सोने की चिड़िया भारत कहा जाता था। उस चिंतन से हमारा समाज दूर होता जा रहा है, जो हमारे संकट का कारण है।
सनातन संस्कार का उद्गम स्थल परिवार व्यवस्था है। हमारे ऋषियों द्वारा दिया गया शाश्वत चिंतन “वसुधैव कुटुम्बकम्” अर्थात पूरा विश्व एक परिवार है। इस परिवार की शांति-समृद्धि का दायित्व हमारा है। इसलिए “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः” का उद्घोष ऋषियों ने किया। यह श्रेष्ठ दर्शन जीवन का अंग बने—ऐसे संस्कारों का बीज गर्भ में ही देने की परंपरा रही है। जर्मनी ट्यूबिंगन विश्वविद्यालय के एक शोध में बताया है कि गर्भावस्था के समय नकारात्मक भाव बनने से महिला के साथ बच्चा पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसलिए हिन्दू परिवारों में गर्भावस्था में गर्भवती महिला को सकारात्मक संस्कार देते हैं। परंतु परिवार व्यवस्था भंग होने के कारण ये परंपराएं कमजोर पड़ती जा रही हैं। फलस्वरूप “मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, अतिथि देवो भव” वाली परिवार-व्यवस्था खंडित होती जा रही है। माता-पिता का अपमान, वृद्धाश्रम के विस्तार इसके उदाहरण हैं।
वनवासी रक्षा परिवार फाउंडेशन