संस्कार परिवार योजना / प्रतिभा विकास केंद्र / रक्षा परिवार योजना

84 लाख योनियों में मनुष्य ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है। भारतीय राज ऋषि भर्तृहरि ने 84 लाख योनियों और मनुष्य योनि में अंतर बताते हुए कहा है :—

“आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम्।
धर्मो हि तेषामधिकः विशेषो धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः॥”

अर्थात धर्म ही वह आधार है जो मनुष्य को मनुष्य बनाता है। चुनौती आने पर संस्कार के अनुसार मनुष्य चिंता या चिंतन करता है। चिंता मनुष्य के जीवन को तनावयुक्त करती है जो संकट का कारण बनता है, पर चिंतन समाधान की दिशा में आगे बढ़ाता है। हम गत सैकड़ों वर्षों से विदेशी आक्रांतावादी समाज का बर्बर हिंसक अत्याचार, नरसंहार, अपने मान बिंदुओं के ध्वस्त होने का दृश्य देखने के बाद भी अपने संस्कारों के कारण हमने केवल अपना अस्तित्व ही नहीं बचाया बल्कि विश्व को समय-समय पर शांति, समृद्धि के साथ मानवता का संदेश देते रहे। गुलामी के कठिन काल में भी स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका के शिकागो की धर्म सभा में “सिस्टर्स एंड ब्रदर्स” शब्दों का संबोधन कर प्राचीन ऋषियों के “वसुधैव कुटुम्बकम्” के चिंतन को ही प्रस्तुत कर सनातन संस्कारों का ध्वज विश्व में फहराया। स्वतंत्रता के बाद मैकालेयन शिक्षा तथा पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव के कारण कमजोर पड़ती परिवार व्यवस्था के फलस्वरूप एक ऐसी पीढ़ी आई है जिसके जीवन में सनातन संस्कार प्रभावहीन होते जा रहे हैं। इसलिए परिवार में सनातन परंपराओं का अभाव दिख रहा है, परिणामस्वरूप व्यक्ति जीवन में दायित्व को स्वीकारने को तैयार नहीं है। यह केवल भारत ही नहीं विश्व मानवता के लिए भी संकट का कारण है।

विश्व में सबसे बड़ा समाज-ईसाई समाज अपने अस्तित्व-रक्षा के संकट से गुजर रहा है। लेबनान कुछ वर्ष पहले ईसाई बहुल्य था आज मुस्लिम बहुल्य हो गया है, यूरोपीय देश भयभीत हैं। किसी भी परंपरा को आगे बढ़ाने के जो मूल आधार परिवार होते हैं पश्चिमी जगत में यह समाप्त होता जा रहा है। इसलिए पश्चिमी जगत के विद्वान भारतीय चिंतन की परिवार व्यवस्था के महत्व को क्रमशः स्वीकारने की स्थिति में आते जा रहे हैं।

दूसरा बड़ा समाज, जो दुनिया में आतंकवाद का पर्याय है, अपनी परिवार व्यवस्था के कारण तेज गति से विस्तार पा रहा है। हिन्दू धर्म शास्त्रों में दानवों के विजय की कहानी उनके संगठित तथा सक्रिय जीवन का परिणाम बताया गया है।

दुनिया का प्राचीनतम और श्रेष्ठतम जीवन-तत्व वाला समाज सनातन समाज है जिसके ऋषियों ने सम्पूर्ण मानवता को मानवीय जीवन का मूल्य समझाया। दुनिया के अधिकांश देशों में इसके चिन्ह विद्यमान हैं। इस सनातन जीवन दर्शन को आधुनिक संदर्भ में पुनः स्थापित करने के लिए संस्कार परिवार योजना की रचना वनवासी रक्षा परिवार फाउंडेशन द्वारा की गई है।

दैनिक गतिविधियाँ

दैनिक गतिविधियाँ

प्रतिभा विकास केन्द्र

समाज का बहुत बड़ा भाग जंगल, पहाड़, पिछड़े गाँव तथा शहर की झुग्गियों में समुचित शिक्षा, संस्कार तथा सुविधाओं के अभाव में अव्यवस्थित, कष्टमय जीवन जीने को विवश है। इन बंधुओं को संस्कारयुक्त शिक्षा के साथ रोजगारोन्मुख स्वावलंबन की शिक्षा के उद्देश्य से “प्रतिभा विकास केंद्र” योजना का शुभारंभ वनवासी रक्षा परिवार फाउंडेशन ने किया। बच्चों के संस्कार तथा शिक्षा पर ही परिवार का भविष्य निर्भर करता है। इसे ध्यान में रखकर प्रतिभा विकास केंद्र की कार्य योजना बनी है।

रक्षा परिवार योजना

“नर सेवा-नारायण सेवा” सनातन धर्म का मूलमंत्र रहा है। इस मंत्र के द्वारा समता तथा समरसता युक्त समाज निर्माण का चिंतन ऋषियों ने दिया था। कालक्रम में कमजोर होते इस चिंतन के कारण समाज में कमजोर और संपन्न के बीच दूरियाँ बढ़ीं। गरीबी एक अभिशाप है, इसको दूर करने के लिए ऋषियों ने दान की महिमा स्थापित की तथा त्यागयुक्त भोग का विचार दिया।

ॐ ईशावास्यमिदं सर्व यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा: मा गृध: कस्यस्विद्धनम्।।

प्रसिद्ध भारतीय मनीषी दीनदयाल उपाध्याय जी ने भारतीय अर्थ जीवन की दिशा में लिखा है — “अर्थ का अभाव मनुष्य को पशुवत् जीवन जीने को विवश करता है पर अर्थ का प्रभाव मनुष्य को रावण बना देता है। दोनों में संतुलन बैठाने के काम के लिए दान की महिमा बताई गई है।”

वनवासी रक्षा परिवार फाउंडेशन समाज के संपन्न बंधुओं द्वारा चाहे वह आर्थिक दृष्टि से हो या संस्कारों की दृष्टि से हो या चिंतन की दृष्टि से हो, वे समाज के कमजोर बंधुओं का सहयोग करें, यह प्रयत्न वनवासी रक्षा परिवार की समितियों द्वारा किया जा रहा है।

संपन्न वर्ग राम की भूमिका में आकर वनवासी तथा वंचित समाज की शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कार, स्वावलंबन, सुरक्षा की आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए तन-मन-धन से सहयोगी बने, ऐसे सहयोगी परिवारों को ही हम “रक्षा परिवार” कहते हैं।

देश तथा समाज का सर्वांगीण विकास सभी प्रबुद्ध नागरिकों का दायित्व है, पर यह दायित्व संपन्न, जागरूक तथा प्रबुद्ध व्यक्तियों का विशेष रूप से है। वनवासी रक्षा परिवार फाउंडेशन के कार्यकर्ता समाज के बंधुओं से मिलकर कराते हैं। भगवान राम ने अपने जीवन के बहुमूल्य प्रारंभिक 14 वर्ष वनवासी समाज के जागरण, शिक्षण तथा संगठन में लगाए और इन वनवासियों के सहयोग से रावण जैसे भयानक अत्याचारी तथा स्वेच्छाचारी का संहार कर सर्वलोककल्याणकारी राम-राज्य की स्थापना की। आज का नगरीय समाज अपने समय, साधन तथा चिंतन का उपयोग करते हुए वर्तमान रावण रूपी विदेशी आतंकवाद, उग्रवाद, अलगाववाद तथा मतांतरण से अपने समाज को बचाने हेतु रक्षा परिवार बनकर आगे आए तथा रामराज्य की स्थापना कर विश्व गुरु भारत बनाने में सहयोगी बने, यह राष्ट्र की आवश्यकता है। तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में रामराज्य की सरल व्याख्या की है—

“दैहिक, दैविक, भौतिक तापा, रामराज कहुँ नहिं व्यापा” - वर्तमान में इस त्रिविध ताप से (वंचित वनवासी समाज को) मुक्त करने का कार्य प्रबुद्ध तथा संपन्न वर्ग करें।

रक्षा परिवार योजना का उद्देश्य

  • नगरीय समाज को वनवासी एवं वंचित समाज के समीप लाकर उनकी समस्याओं से परिचय कराना।
  • अगले 5 वर्षों में एक लाख नगरीय परिवारों को वनवासी तथा वंचित परिवार को गोद लेने के लिए तैयार करना अर्थात रक्षा परिवार बनाना।
  • नगरीय तथा वनवासी क्षेत्रों में सांस्कृतिक जनजागरण हेतु कार्यक्रमों का आयोजन करना।
  • वनबंधुओं के सांस्कृतिक एवं आर्थिक सशक्तिकरण के लिए स्वरोजगार का प्रशिक्षण देना।
  • संस्कार शिक्षा के माध्यम से व्यसन तथा सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध जागरूकता पैदा करना।
  • युवा बंधुओं को स्थानीय संसाधन—गाय, गोबर तथा वन-संपदा पर आधारित जैविक खेती तथा उसके माध्यम से उस पर आधारित स्वरोजगार के लिए प्रोत्साहित करना एवं प्रशिक्षण की व्यवस्था करना।
  • सनातन संस्कृति, संस्कार, नैतिक मूल्यों एवं परंपराओं के संरक्षण-संवर्धन के प्रयासों को प्रोत्साहन देना।
  • वनवासियों की परंपरा एवं आध्यात्मिक आस्थाओं को बढ़ाना और उन्हें भय, प्रलोभन से किए जाने वाले मतांतरण (धर्मांतरण) से बचाना।
  • अधिकाधिक वनयात्राओं का आयोजन कर वनांचलों में वनतीर्थ पर्यटन को बढ़ावा देना जो वनबंधुओं के आर्थिक विकास में सहायक होगा।
  • जल, जंगल, जमीन और पर्यावरण के संरक्षण के लिए कार्य करना।
  • वनबंधुओं को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक करना एवं सरकारी योजनाओं की जानकारी देना।
  • नगरीय परिवार को “संस्कार परिवार योजना” के साथ जोड़कर उन्हें स्वस्थ, सुरक्षित तथा संस्कारित बनाना।
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विचार

वनवासी रक्षा परिवार फाउंडेशन